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Wednesday, September 26, 2012

प्रतिष्ठित करते हुए


एक लिफ़ाफे में
वो एक कटी हुई अँगुली थी
जिसने सहमति
का पत्र लिखा था

मेरे पिता
शब्दों और अँकों को
खो देने के बाद मैं अभी तक
रोये चला जा रहा हूँ

पहाडि़यों के उस पार
मैंने अपनी कविताओें का गूढ़ भेद

भेज दिया था जिन्होंने मुझे उस
चाकू का नाम नहीं बताया

था जो मेरी पीठ में
हया में लिपटे हुए
अज्ञात भाइयों ने घोंप दिया था
अब मैं पूरी जि़न्दगी
हरा ज़ख्म लेकर जिऊँगा

यह केवल क्षमायाचना थी   मैं
अब भी चलता रहूँगा उन पैर
की अँगुलियों के सहारे जो
पीठ पर उभरे निशानों को ज़मीन पर कुरेद रही थीं

सतीश वर्मा

Sunday, September 16, 2012

कंटीलापन


एक आरोही सुन्नता में,
रात्रि में तुम साफ़ साफ़ सोचने लगते हो
और उस अर्धचाँद की तरफ देखते हो
जो मद्धम रोषनी में छायाचित्रों को फेंक रहा था
अपनी जड़ों का अपमान करते हुए
उस डूबती लपट का पूर्वानुमान करते हो
फिर अपनी कविताआे में व्यथित होने लगते हो
बढ़ती हुई निश्फलता जैसे सतह से उठती हुई
पीड़ा में · इकेरस की छाया   बिना
प्रष्नों का एक उत्तर मृत्यु का मुखौटा पहने हुए   क्या
यह एक प्रिज्म़ लिये हुए संवृत-स्थान के प्यार की
कल्पना थीसंगमरमरी गोलाइयाँ पिघलने
लगी हैं   खतरा सामने है
तुम्हें इसकी गन्ध महसूस होती  है
टूषे   विरोधी का हमला कारगर हुआ है

सतीश वर्मा


· यूनान की पौराणिक एक कथा में इकेरस एक प्रसिद्ध षिल्पी, काश्टकारी के जनक, डेडलस का बेटा था जो क्रेट की ज़ेल  से जब भाग रहा था तो इसके पिता ने उसे पँख बना कर दिये थे लेकिन इकेरस सूर्य के बहुत निकट पहुँच गया और मारा गया क्याेंकि पँखों को चिपकाने वाली मोम पिघल गयी थी

Saturday, September 15, 2012

आदर्श लोक


क्या कोई विकल्प रह गया था ?
हिंसा वही थी
बुराई शांतिवाद में भी थी

दस्तख़तों वाले पेड़ पौधे
एक मानसिक सन्तुलन प्रदर्शित करते हैं
मैं अपूर्णता को याद करता रहता हूँ

एक अवसादी पल में, मैं चाँद की हत्या
कर देता हुं और अँगारों पर चहलकदमी
करने लगता हूँ ज़रा मुझे अपना हाथ देना

अब कोई भी पथ नज़र नहीं रहा था
लेकिन वृक्ष बालू-तट पर चल रहे थे
लिंगों में ाुरू हई लड़ाई

कभी खत्म नहीं होगी   तितलियाें
को कैद करने वाले का रहस्य बहुत पहिले
ही कहीं गाड़ दिया गया था

बचपन से अब झूठाें के जंगल में
प्रविश्टि हुई थी   यह एक लम्बी यात्रा की
गन्धों की विस्मृति को झेलते हुए
सतीष वर्मा

Friday, September 14, 2012

नाज़ुक स्थिति


जब जि़न्दगी गुजर जाये
और सारे तोते उड़ जायें
तो तुम मुझे नहर ले जाना

पूरा जीवन छोटे छोटे पदचिन्हों पर
चलते बीत गया    सारे रास्ते आधारनामों
की भीड़ रही
जब एक नाम पूरा हो जाये
और बालों की टोपियाँ उतर जायें
तो तुम मुझे नहर ले जाना

जब तुम्हारी काट कर हत्या की जा रही थी
और बच्चों के हाथों  में बन्दूकें थीं
तुमने अपना शोकगीत स्वयं ही लिख लिया था
जब सड़क बन जायेगी और
पत्थर हट जायेंगे
तो तुम मुझे नहर ले जाना

ऊँची
एन नीले चाँद की रात एक दिन हाथी
घास में यात्रा शुरू होगी जहाँ
झाडि़यों के पीछे वो छिपे बैठे है    जब
मैं गुलाबी और सफेद एक
पताका फहराऊँगा
तो तुम मुझे नहर ले जाना

हथकड़ी पहिनाकर
किसी अज्ञात साजि़श के तहत सच्चाई को
जेल भेजा गया है  मैं जब तुम्हारे लिये एक कब्र खोदूँगा
तो तुम मुझे नहर ले जाना

सतीश वर्मा