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Saturday, August 21, 2010

त्रिक

सोती हुई जीन भी  आँखों में सुइयाँ लिये
धमाके से गिरने के बाद सबक सीखती हैं
एक निष्कपट घर भी एक अशीर्वाद का
असर धूमिल होने के बाद मिटने की सोचता है
एक विधर्मी की विरासत फिर भी जीती है
अपने साथ एक दर्पण, भंजित फटे जुए जोड़ों को लेकर
नाचती हुई आत्माओं की काली रात में वहशी होंठ
एक बाघ का मुख चूमते हैं

सफेद डेज़ी के परित्यक्त बिस्तर पर एक प्रचन्ड साँड
उस लड़की को अंकुशों से उभाड़ने की कोशिश करता है
जिसका बलात्कार हो चुका है सारे जंगली शिकारी
एक पहियाकुर्सी की मरहमपट्टियों को ठगने की
कोशिश में रहते हैं काँपते हुए तारकाभ अब गूढ़
अन्धकार में बिखरना शुरू कर देते हैं एक हत्या के
बाद दुनियाँ जैसे खत्म हो जाती है, शोकमय लोग
पुष्पहार बिछाते हैं और चेतन्य आँखों पर होने वाले हमलों
के लिये साइनाइड कैप्स्यूल बाँटना शुरू कर देते हैं

सतीश वर्मा

शैल और कपाल

एक एपीड्यूरल इन्जेक्शन के समान था
खामोशी के सूखे टुकड़े नीचे उतर रहे थे
एक मृतजात बालक के समान रूधिर के गोले
से सूर्य का सिर तड़ाक से बाहर निकल आया था

पर्वत में कुछ अपराध बोध की भावना झलक
रही थी इसने अपना मूड़ बदल लिया
और बादलों से बात करने लगा जबतक कि
आकाश सूर्ख लाल हो गया

झरनों के पास गंजे उल्लुओं के लिये एक सवाल
था जिन की पलकरहित आँखों के नीचे अपवित्र
रात्रि भोजन के बाद एक बृहत बर्बादी के
सन्देश थे मैं जानता हूँ कि तुम्हारी महिमा

इशारा कर रही थी कि सामूहिक कब्र से
हड्डियों के ऊपर से माँस उतार दिया जाये उन
पंखिल बीजों का जो अनपकी कलियों
में हिंसा के शिकार हो गये थे मैं अभी तक
गर्दन ऊँची आँसूविहीन नज़र का सामना कर पाया हूँ

सतीश वर्मा

सफेद घर

यह एक शहर के साथ हुआ बलात्कार था कर लो
जो तुम चाहते हो परन्तु मैं तो अब भी
पुरानी शैली में अपनी बात करूँगा
पीठ के दर्द के साथ

और मौन को एक फूले हुए
दिल के खूबसूरत खालीपन में
उड़ने दूँगा

गुमनामी की खातिर
मैं अपने नाम को
उलझे हुए यश के जाल से बचाना चाहता था

मृत्योपरान्त शब्दों का सुख चैन
मिलता है जब स्पष्टता
एक अर्थ के घर में प्रवेश करती है

सतीश  वर्मा

जल-प्रलय का शोक मनाते हुए

लक्षणों से कोई शिष्ट बात नज़र नहीं आ रही थी
देवताओं के अपवित्रीकृत बिस्तरों की गाथा
नीचे बह कर आ गई थी

एक काले चाँद का मद्धम बिम्ब
खिड़की पर चढ़ रहा था और
प्रत्येक घर ने अपना एक बेटा सौंप दिया था

ताकि प्रतिशोध की लड़ाई जारी रहे  दुर्भावना
सबके लिये, हर एक के लिये, वो उन सब लोगों
के हाथ काटने को तैयार थे जिन्होंने किताब पकड़ रखी थी

जब तुम पारे का इस्तेमाल करते हो तो कच्ची
धातु से सोना निकलता है खाली आँखों पर
आंसओं का अवगुंठन था नमी हड्डियों को गला रही थी

चेहरे पर कीचड़, जन्म दिन का उपहार था

सतीश वर्मा

एक बार

शिखरों की खामोशी को लूटते हुए
तुम पूरे आकाश को खोलना चाहते हो
और एक रहस्य की तरफ झुकते हुए श्रद्धालु बन जाते हो

एक बेतुकी प्रणाली से उन्नयन प्राप्त करते हुए
मैं अभी भी ईमानदारी और निष्ठा की बात
कर रहा था जो अर्थहीन जीवन की गर्दिश बेमानी लगती थी

किसी आस्था की बात नहीं थी परन्तु अज्ञात  
के दरवाज़े तक पहुँचने की ललक थी, एक भूखे
बच्चे की चीखों के लिये कुछ करने की जरूरत थी

वो सच यहाँ नहीं दिखाई दे रहा था न ही
आने वाले कल के भगवानों के पास तब फिर बताओ
नयी जन्मी मानव सभ्यता की संस्पर्शित हड्डियों में

हम कहाँ मिलेंगे? चाँद में मृत्यु-इच्छा का
आसन्न संगीत धीरे धीरे बज रहा था जो एक
चुम्बन के बाद फुर्र से उड़ गया

सतीश वर्मा

Thursday, August 19, 2010

कहीं नहीं जाना

नील हिमवर्त्तिकाओं पर
तुम वृत्ताकार इलेक्ट्रान से टकरा रहे थे

एक दोलन कुर्सी पर नंगी टाँगे
चाक्षुष शब्दों का अलौकिक स्वरूप
अतीन्द्रियदर्शी बनने का इन्तज़ार कर रहा था
सूर्य सरहदों के पार उतर गया था

मेरी आँखें गीली हो गई थीं जहाज़ डूबने के बाद,
उसके तल की प्रतिध्वनियाँ सुनाई दे रही थी, ऐतिहासिक आलेख
मटमैले पानी में तैर रहे थे
क्या तुम स्पान्दित होते दर्द को हरा सकते हो

ज़मानती नशा अभी चल रहा था, लेकिन अभी
तक सुबह की सफेदी नहीं छायी थी, शिखरों
पर धुँधले बादल बिखरे थे, कहीं कहीं नारंगी
रंग, शायद लाल रक्त की धूमिल छाया दिखा रहे थे

गहरे समुद्र में लाखों आवाज़ों का एक सिलसिला
प्रतिशोध लेने की तैयारी कर रहा था

सतीश वर्मा

*जवाब देने का वक्त

सचेत होने पर, मेरी तुम्हारे लिये जवाबदेही
के परिभाषित होने का पल आ गया है
पूर्ण विलीन होने के लिये सीखंचों के पीछे उम्रकैद या मृत्युदन्ड, क्योंकि

आहिस्ता आहिस्ता नीवों में पाप रिस गया था एक चौथाई
शताब्दी तक खिसकते हुए रेत के टीबों पर गुज़रता हुआ
एक कारवां और उसकी धुधली तस्वीर, यह तबाही एक आत्म-सन्तुष्ट

 ऩखलिस्तान में जाकर काली पड़ गयी थी,
जु़ल्म की शिकार हुई किशोरी वापिस अक्षतयोनि नहीं बन
पायेगी  मृतअन्धे अब विषाद मनाने वालों पर नज़र रखेंगे

मैं उस की जीभ पर असंख्य तारे छोड़ जाऊँगा और तुम
घर के कैदखाने में
उन रोती हुई दीवारों और भयभीत खिड़कियों को भूल जाओगे,
जहाँ रोज का भोजन सेक्स और बलात्कार होता था

हारे हुए चाँद की शक्ल नज़र आने के बाद
गुनाह और माफी नाम की अजीब परछाइयाँ अब नीले आकाश
पर उभर रही है

*जोसेफ फ्रिट्ज्ल पर 19 मार्च 2009 को हुए फैसले के सुनने के बाद
सतीश वर्मा