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Friday, September 10, 2010

दस्ताने

आज मैं अपने आप में साबुत नहीं हूँ, शान्तमना;
एक उजड़े हुए भूदृश्य को स्तम्भित करने के लिये
पूरी रात एक रक्तिम चाँद मेरे चारों तरफ
मँडरा रहा था मैं विदाई के लिये तैयार नहीं था,
पानी की गाँठें खोलते हुए जैसे कोई तूफान एक गहरे
समुद्र की छिपी हुई गुफा का द्वार खोलने लगे, हमारे
बीच में कुछ अनकहा रह गया था, एक नयी क्रिया
अजीब संज्ञाओं को जोड़ते हुए होंठ मूँगे आँसुओं पर
तैरते हुए हमलों के शिथिल शब्दों के बीच और
भंगित हस्ताक्षरों के ज़ख्मों के साथ रह गये थे
सिर्फ परिक्रमा-पथ

सतीश वर्मा

अंहकार

कभी कभी यह पिघली मोम की तरह
चूता है किसी मोमबत्ती से
तुम्हारा आधासीसी सिरदर्द

मैं अब युद्ध विराम चाहता था
भ्रान्तियों को सुलझाने के लिये
मैं तुम्हारी गोली के निशाने पर नहीं हूँ

तुम्हारी बन्दूक की नली के मुँह पर रखा हुआ गुलाब
कभी भी गोलियों को भूल नहीं सकता
अन्त्येष्टि के बाद कोई समारोह नहीं होगा

झील पर किसी की क्रूर हत्या हो गई थी
बालूतट को प्रभा देने के लिये चाँद
को एक नीली बिदाई को अंजलि दे दो

उन्मादियों के घर में विरोध प्रकट करने वालों
की दबी हुई आवाज़ में सूर्य को वापिस आमन्त्रित
करने कौन प्रार्थना कर रहा था?

सतीश वर्मा

बन्धक

साथ साथ रह कर
मेरी कविताऐं मुझे उदास कर जाती हैं

तुम तो वक्त की पहिचान हो
मेरी देह रेत पर ज़ख्मों के निशान छोड़ जाती है

एक बार फिर मैं अपने टूटे फूटे घर गया था
चाँद के नीचे सोने के लिये

सिर्फ एक छोटी सी खिड़की से
मैं रात भर सितारों को देखता रहा

सोच विचार करने और संश्लेषित पिताओं
और किराये  के गर्भाशयों की झील में कूदने के लिये

यह सन्तप्त आस्था अब तुम्हें उत्तरदायी मानती है
हे भगवान, विपर्यस्त क्रम में, तुम आदमी बन जाओ

सतीश वर्मा

भविष्य के चिन्ह

तुम्हारे रिसते खून के पीछे आते भेड़िये
को टालने के  लिये
तुम उत्पीड़ित होकर
मलबे को छानते हो

एक डर की परछाई
पीले गुनाह के अन्यत्व पर आबद्ध
धमकाती है, सफेद खौफ का
एक आत्महत्या नोट
अब तुम अपने कम्पनों से बाहर आ गये हो 
मृतजात, अनिश्चित काल तक

तुम्हारी गर्दन के चारों तरफ लिपटी हुई
नाभिनाल, गला घोंट रही है, भींच रही है
प्रश्नकर्ता को आघात देने के बाद
मैं गहरे पानी में पैठ गया हूँ

अब तुम्हारा शरीर अविश्वास और आतंक की नाव बन गया है
बीजों और पक्षियों के साथ सहयोग
करके सच्चाई के पार, मैं अपनी कला
पर खेद जताने लगता हूँ

सतीश वर्मा

शब्द

क्या पोर की हड्डियों में पुनः प्रवेश अपवित्रीकरण था
तुम्हारे प्रिमरोज़ के बारे में सोचते हुए बेघर
परिन्दों के बगीचे में टहनियों का प्रतिक्षेप
ज़िन्दगी के उलझे हुए भूदृश्य में नीली हवाओं
की पागल दौड़ की महत्वाकाँक्षा?

मेरी पर्वत श्रृखलाओं पर मोर्चाबन्दी की खाई, अधपकी पक्तियों की अस्थियाँ
चारों तरफ बिखरी पड़ी हैं, शाँति की नकल करने में
राजनीति सफल नहीं हुई है, मृत शब्दों ने मेरी सच्चाइयों
को जकड़ लिया है, क्या तुम्हारे लिये यह ज़रूरी था
कि तुम सर्जन की हत्या कर देते जिसने चोर की कलाई
को काटा था?

मैं अनियंत्रित रूप से ध्रुवतारे पर गिरता जा रहा हूँ
उड़ते हुए हँसों के पंखों पर आतंक चिपका है
एक अनजाने हिलते हुए बहुत बड़े सिर वाला बच्चा कुर्सी पर बैठा है
और एक चक्रवाती तूफान गिरती हुई गूँगी
रोशनी पर टूट पड़ा है

सतीश वर्मा

Monday, August 23, 2010

अभी अभी क्रन्दन

अपने अज्ञात मैं को पहिले से ही
नहीं जानना चाहता हूँ जीभ के सिरे पर
एक अविकसित मौन अपनी विलक्षणता के साथ बैठा है

मैं और मेरा दीपक अन्धेरे में जल रहे हैं, हार कर
एक विफल राज्य की संघनित प्रार्थना
आनेवाली पीढ़ियों को निराश कर रही है

डूबी हुई आँखों से एक विपर्यय दर्द
बाहर आता है हत्याकाण्ड का अपराधकर्ता
छोटे बालकों से क्षमादान चाहता है

परछाई के इस तरफ, दूसरे किनारे पर
एक गँवारू दरिया ने छुरी से कत्ल हुए एक आदमी
ने लाश फेंकी है एक डूबते हुए जहाज़ की दूसरी
प्रस्तावना शुरू होती है

चूहे भुनभुनाते हैं रोशनी के मृत बच्चे को
काट जाते हैं आकाश एक रेश्मी जादू
के निष्कपट खिलौनों से खेलता है रोबोटों
ने सिंहासन पर अधिकार कर लिया है

सतीश वर्मा

कत्ल की गन्ध

एक वहशी ख्याल जैसे किसी की गर्दन
कलम करने का उठता है, एक परेशान दिल
में एक गीत को नाम मिलता है ताकि वो
काली मकड़ी की जु़बान पर धब्बा मिटा सके
तुम फिर एक खूबसूरत मौत के लिये
अपनी नींद को दाँव पर लगाना चाहते हो

सोचो क्या होगा जब तुम अपने बदन से एक नीली
रोशनी की किरणपुंज की तरह निकल कर चमकते हुए
शोकगीतों में एक काला छेद कर दो, तुम्हारे हाथों पर
छपी हुई रेखाएं कुछ अलग बात कहती हैं जब
श्रवणता सुन न सके और देह अनबोली रहे

भेड़िये आ रहे है, किसी को भी गोलियों की परवाह
नहीं है, अँधेरे में निकलना चाहते है, एक अयिथार्थवादी
समवेत गान गदर का बिगुल बजाता है या फरिश्ते
आसमान से उतरते हैं, एक तेज़ाब चेहरे और गुलाबी
होंठों पर फेंका जाता है क्योंकि उन्होंने नये लफ्ज़ों
को ढूँढ लिया था

सतीश वर्मा